Success Story

Success Story : 1

Smt Durga Devi

Tital: Adoption of candle making technique

Traditional farming and practices are the sustainable way of livelihood of rural masses of village Dogda and the nearby areas. This village is located at 15 km and 35 km from the KVK and district head quarter. Sufficient transport facility is also ply from this area. The majority of the male population of area is engaged in agriculture. During the one the visit of KVK scientist in year 2009 the female farmer (Smt Durga Devi) insisted that some income generating activities should be started for them so as they can increase their household income as a whole.

Based on this Home Scientist of the KVK asked them the importance of Candle making. Candle making is a act which can be adopted as a small scale entrepreneur by rural population without having any much literacy and skill. Home scientist of the KVK formed a group of 20 female residents of the area. Smt Durga Devi and follow colleague named the group as Jagrate. On the demand of Smt Durga Devi KVK conducted 4 training programme with vigorous practical exercise. Smt Durga Devi purchased a simple Sancha from the Nainital and started producing candles. Initially she used to give the produce to their follow residents on gift basis. Slowly with the help of her husband she started to supply the produce to market of Nainital and Haldawni. Inspired by the KVK now she has started producing decorative candles which is helping her to earn more profit.

Analysis of Cost - Benefit Ratio

Material Rate/kg Quantity (kg) Expenses (Rs.)
WAX 100.00 30.00 3000.00
Dhaga 70.00 0.50 35.00
Other expenditure like labour and gas etc. L. S. 1000.00
Total 4035.00

Total expenses = Rs. 4035.00

Market value of ready material = no. of candle x cost of one candle
= 750 x 10.00
= Rs. 7500.00

Net profit = Market value – total expense
= Rs. 7500.00 – Rs. 4035.00
= Rs. 3465.00

Horizental Expansion

Inspired by the success of Smt Durga Devi the residents of village of nearby area such as Bhaluti, Sariatal, Morra started coming at KVK and requested the Home Scientist to start the same at their village too. KVK promoted Smt Durga Devi for this purpose. She has now to become the master trainer of this technology. After that in the year 2011-12 Smt Durga Devi conducted a number of training programme for candle making. Village of Bhaluti, Sariatal, Morra been invited her so many times to trained their rural masses.


प्रस्तावना

नैनीताल जनपद का कृषि विज्ञान केन्द्र सन् 2004 में मझेंड़ा में स्थापित हुआ था। इसके बाद सन् 2006 को ज्योलीकोट में स्थानान्तरित हो गया है। कृषि विज्ञान केन्द्र, ज्योलीकोट काठगोदाम नैनीताल सड़क मार्ग पर काठगोदाम से लगभग 17 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। नैनीताल जनपद में तराई, भाबर तथा पर्वतीय क्षेत्र आते हैं अधिकतर क्षेत्र पर्वतीय है। पर्वतीय क्षेत्रों में कृषकों की जोत छोटी एवं बिखरी हुई है अधिकतर खेती वर्षा पर आधारित है। इसलिए कृषकों को सीमित भूमि से कम आय प्राप्त होती है। जलवायु में विविधता के कारण कृषक वर्ष भर नम तथा उष्ण जलवायु में आने वाली छोटी अवधि की फसल को उगाते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों की चुनौतियों को देखते हुए निम्नलिखित आवश्यकताएं जान पड़ती है।

  • उन्नत प्रजातियों का उपयोग कर उत्पादन में वृद्वि
  • बेमौसमी सब्जियों का उत्पादन
  • फसलों को कीट एवं रोगों से बचाव हेतु समन्वित नाशीजीव प्रबन्धन
  • गा्रमीण महिलाओं/पुरुषों हेतु रोजगार परक कार्यक्रम
  • पशुओं की नस्लों में सुधार एवं समुचित पोषण प्रबन्धन
  • औषधीय एवं सगन्ध फसलों की खेती
  • फसलों में एकीकृत पोषक तत्व प्रबन्धन
  • कृषि विविधीकरण
  • उक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कृषि विज्ञान केन्द्र, ज्योलीकोट के वैज्ञानिक निरन्तर प्रयासरत हैं। केन्द्र द्वारा समय-समय पर प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और कृषक भरपूर लाभ उठा रहें हैं। किसानों ने जो तकनीकी अंगीकृत की है उनमें से कुछ सफलता की कहानियों का संक्षेप में उल्लेख आगे किया गया है।


    सफलता की कहानी

    सब्जियों में समेकित नाशीजीव प्रबन्धन

    उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में जोत छोटी होने के कारण कृषक फसल सुरक्षा सम्बन्धी रसायनों का तर्कसंगत प्रयोग नहीं करते हैं जिस कारण सब्जियों का उत्पादन कम होता जा रहा है। चूंकि अब किसानों के पास कोई विकल्प नहीं बचा था इसलिए समेकित नाशीजीव प्रबन्धन की आवश्यकता महसूस हुई। यह कार्यक्रम लगभग लागत विहीन है उन्होंनंे कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों द्वारा बतायी गयी समस्त तकनीकों को अपनाया जिससे उनके खेतों की मृदा की संरचना सुधरी, कीट एवं बीमारियों का प्रकोप निरन्तर कम होता गया और कृषक सब्जी उत्पादन कर लाभ लेने की स्थिति में पहुंॅच गये। कुछ एसे कृषकों की सफलताएं निम्न प्रकार है।

    श्री गोविन्द बल्लभ पलडिया

    गांव दोगड़ा, काठगोदाम-नैनीताल सड़क मार्ग पर कृषि विज्ञान केन्द्र, ज्योलीकोट से लगभग 15 किमी. की दूरी पर स्थित है। श्री पलडिया सब्जियों में मटर, शिमलामिर्च तथा मिर्च की खेती 20 वर्षो से कर रहे हैं। विगत 6-7 वर्षो से इनकी फसल कीट एवं बीमारियों की समस्याओं से ग्रस्त थी। वर्ष 2009 में इन्होंने समेकित नाशीजीव प्रबन्धन की जानकारी कृषि विज्ञान केन्द्र, ज्योलीकोट से प्राप्त की और इस कार्यक्रम से जुड़ गये। प्रारम्भ में उन्होंने वर्मी कम्पोस्ट बनाया तथा सब्जियों की पौधशाला में जैव अभिकर्ता ट्राइकोडर्मा हारजियानम एवं स्यूडोमोनास फ्लोरीसेन्स का प्रयोग किया। अगले वर्ष उन्होंने प्रारम्भ से ही नर्सरी के लिए स्थान का चयन, नर्सरी की मृदा का सौरीकरण, रोगरोधी प्रजातियों का चयन, नर्सरी एवं खेतों में जैव अभिकर्ता का प्रयोग, कुरमुला व्यस्क के लिए प्रकाश प्रपंच का प्रयोग, वर्मी कम्पोस्ट का खेतों में अधिक से अधिक प्रयोग, जैविक कीटनाशक व्यूवेरिया बेसियाना एवं सुरक्षित कृषि रसायनों का संस्तुत दर में प्रयोग किया।

    गा्रम दोगड़ा के श्री गोविन्द बल्लभ पलडिया बताते हैं कि समेकित नाशीजीव प्रबन्धन की समस्त पद्वतियों को अपनाने से खेतों में बीमारियों का प्रकोप नगन्य था। खेतों में मित्र कीटों की पहचान कर उन्हें जंगल से इकट्ठा किया और अपने खेतों में छोड़ा धीरे-धीरे उनके खेतों में मित्र सूक्ष्म जीवों एवं कीटों की संख्या में वृद्वि हुई। गांव दोगड़ा के अन्य किसान श्री हरीश चन्द्र, श्रीमती हीरा देवी, श्रीमती हंसी देवी तथा श्रीमती भागीरथी देवी ने भी श्री गोविन्द बल्लभ पलडिया के समान समेकित नाशीजीव पद्वति अपनायी। कृषिकों ने बताया कि इस पद्वति को अपनाने के पश्चात जहां एक ओर उनकी उत्पादन लागत कम हुई वहीं उनके खेतों में कीट एवं बीमारियों का प्रकोप भी कम हुआ है। वर्तमान में गा्रम दोगड़ा के किसान स्वंय अनेक गांवों में जाकर लोगों के समेकित नाशीजीव प्रबन्धन प्रणाली अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हंै।

    श्री मोहन सिंह

    गेठिया गांव में श्री मोहन सिंह पूर्व से ही मिर्च एवं शिमला मिर्च की खेती अधिक करते रहे हैं। उन्होंने बताया कि विगत 5-6 वर्षो से उनकी मिर्च की फसल अत्यधिक रोगों से ग्रस्त होती आ रही थी। उकठा रोग के कारण मिर्च की फसल में लगभग 60 प्रतिशत तक हानि होती थी। उन्होंने वर्ष 2009 में समेकित नाशीजीव प्रबन्धन प्रणाली के बारे में कृषि विज्ञान केन्द्र, ज्योलीकोट से जानकारी ली तथा इस प्रणाली को अपनाया। उन्हें प्रथम वर्ष में ही अप्रत्याशित लाभ मिला। अब वह बिना वैज्ञानिक सलाह लिए कोई कृषि कार्य नहीं करते हैं।

    उक्त गांवों में कृषि विज्ञान केन्द्र, ज्योलीकोट द्वारा समेकित नाशीजीव प्रणाली पर जो प्रदर्शन कृषकों के खेतों पर लगाये गये उनका विवरण निम्न तालिका में दर्शाया गया है।

    क्र,सं. फसल प्रजाति प्रदर्शनों की संख्या रोग का प्रकोप पौधगलान/जड़ गलन (%) रोग का प्रकोप उकठा रोग/पाउड्री मिल्डयू (%) उपज कु./है. उपज में प्रतिशत वृद्वि
    1 शिमला मिर्च कैलिफोर्निया वन्डर 10 प्रदर्शन : 3.4
    स्थानीय : 18.6
    प्रदर्शन : 5.8
    स्थानीय : 18.1
    प्रदर्शन : 114.13
    स्थानीय : 83.64
    36.45
    2 मिर्च दुशहरी 10 प्रदर्शन : 6.7
    स्थानीय : 16.7
    प्रदर्शन : 4.4
    स्थानीय : 16.4
    प्रदर्शन : 51.0
    स्थानीय : 40.99
    24.42
    3 सब्जी मटर अर्किल 10 प्रदर्शन : 6.5
    स्थानीय : 35.0
    प्रदर्शन : 6.8
    स्थानीय : 16.8
    प्रदर्शन : 49.87
    स्थानीय : 32.81
    51.99

    लोहाली गांव का डेरी गांव के रुप में परिवर्तन

    लोहाली गांव नैनीताल जनपद के बेतालघाट ब्लाक में, अल्मोड़ा, भवाली सड़क मार्ग पर स्थित हैं यह गांव सड़क मार्ग से मात्र 4 किमी. की दूरी पर स्थित है। गांव के कृषक अधिकतर खेती करते हैं लेकिन सिंचाई की सुविधा न होने के कारण खेती में अधिक लाभ नहीं कमा पाते। इस तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए कुछ कृषक श्री लीलाधर भट्ट, श्री भुवन चन्द्र धानी, श्री खुशाल सिंह आदि ने कृषि विज्ञान केन्द्र के प्रभारी अधिकारी से सम्पर्क किया और अपनी समस्याओं से अवगत कराया। केन्द्र के वैज्ञानिकों ने गांव का भ्रमण किया तथा यह नोट किया कि गांव के लोग गाय, भैंस पालते हैं लेकिन अच्छे नस्ल के पशु न होने के कारण गाय भैंस अधिकतर 1.5-2.0 कि.ग्रा. दूध प्रतिदिन देते हैं जो कि दूध का उत्पादन अत्यधिक कम है। पशुओं में कुपोषण, कृत्रिम गर्भाधान की कमी और पशुओं में होने वाले रोगों की रोकथाम की कमी, कम दुग्ध उत्पादन के मुख्य कारण थे। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए कृषि विज्ञान केन्द्र एवं कृषि अनुसंधान केन्द्र, मझेड़ा के वैज्ञानिकों ने लोहाली गांव को अंगीकृत किया तथा पशुओं में दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से कार्य करना प्रारम्भ कर दिया। पशुओं की नस्ल सुधारने के उद्देश्य से गांव में प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किये गये। प्रशिक्षण के दौरान कृत्रिम गर्भाधान की विस्तृत जानकारी दी गयी जिससे समय पर पशु गर्भित हो और अच्छी नस्ल के बछड़े तथा बछिया उत्पन्न हों। पशुओं में खुरपका तथा मुॅहपका आदि रोगों से बचाव हेतु टीकाकरण कराया गया तथा टीकाकरणका महत्व और उसके बारे में विस्तृत जानकारी दी गयी। पशुओं को अन्तरजीवी तथा बाहय परजीवियों से बचाने के उपाय बताये गये और दवाइयाॅं वितरित की गयीं। पशुओं में कुपोषण ना हो उसके लिए हरा चारा जैसे मक्का, लोबिया ज्वार नेपियर घास आदि के उत्पादन की वैज्ञानिक जानकारी दी गयी और इन फसलांे के बीज वितरित किये गये। पशुओं में पोषक तत्वों की कमी पूर्ति के लिए मिनरल मिक्चर नियमित रुप से देने के लिए कृषकों को प्रशिक्षित किया गया। गांव के कृषकों ने प्रशिक्षण कार्यक्रमों में उत्साहपूर्वक भाग लिया और वैज्ञानिकों की सलाह मानकर पशुपालन पर जोर देना प्रारम्भ किया। पशुओं की नस्लों में सुधार हुआ तथा पशुओं का स्वास्थ्य भी अच्छा होने लगा। इन सब के परिणम स्वरुप गाय भैंस का दुग्ध उत्पादन 4-6 कि.ग्रा. प्रतिदिन हो गया कृषकों को आर्थिक लाभ मिलने लगा जिससे प्रेरित होकर गांव के अधिकतर किसानों ने पशुपालन प्रारम्भ कर दिया और लोहाली गांव डेरी गांव के रुप में विख्यात हो गया। सहकारी डेरी के माध्यम से गांव वालों को दूध की बिक्री में कोई समस्या नहीं होती है।


    धनिया की वैज्ञानिक खेती (पन्त हरितिमा प्रजाति का सफल प्रदर्शन)

    ब्लाक भीमताल के गा्रम सरियाताल तथा आसपास के गांवों में कृषक धनिया का उत्पादन सितम्बर-अक्टूबर में करते हैं। हरा धनिया इस समय के 5रु प्रति 50 गा्रम के हिसाब से बेचते हैं लेकिन कृषक धनिया की पुरानी प्रजाति प्रयोग करते हैं। फसल के समय बरसात होने के कारण धनिया की फसल में उकठा रोग आदि की समस्या अधिक आती है जिस कारण धनिया का उत्पादन बहुत कम हो जाता है इस समस्या को देखते हुए गा्रम सरियाताल के कुछ किसान जैसे श्री कुन्दन सिंह जीना, श्री बालम सिंह जीना, श्री कमल सिंह जीना आदि कृषि विज्ञान केन्द्र, ज्योलीकोट के वैज्ञानिकों से मिले और अपनी समस्याओं से अवगत कराया। किसानों की समस्या को ध्यान में रखते हुए, केन्द्र के वैज्ञानिकों ने गा्रम का भ्रमण किया तथा धनिया की वैज्ञानिक खेती पर गा्रम में प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किये पन्त हरितिमा प्रजाति पर प्रदर्शन लगाये गये। धनिया की फसल में मुख्य समस्या धनिया की पुरानी प्रजाति की थी। वैज्ञानिकों ने कृषकों को उन्नत प्रजाति पन्त हरितिमा को उगाने की सलाह दी। किसान धनिया की बुवाई छिटकवांॅ विधि से करते थे जिससे खरपतवार दूर करने में समस्या रहती थी और रोगों का प्रकोप अधिक होता था। प्रशिक्षण में कृषकों को बताया गया कि धनिया की बुवाई लाइनों में करें लाइन से लाइन की दूरी 30 सेमी. होनी चाहिए और रोगों से बचाव हेतु ट्राइकोडर्मा का प्रयोग करें। कृषकों ने वैज्ञानिकों की सलाह मानी और पन्त हरितिमा प्रजाति का प्रयोग प्रारम्भ कर दिया। इस प्रजाति की सफलता देखकर, सरियाताल के किसानों ने पन्तनगर किसान मेला से पन्त हरितिमा प्रजाति मा 50 कि.गा्र. बीज खरीदा। किसानों की मांग को देखते हुए कृषि विज्ञान केन्द्र ने 2 कुन्तल बीज उक्त प्रजाति का खरीदा और किसानों की पूर्ति की। गा्रम सरियाताल में धनिया की इस प्रजाति की सफलता देखते हुए आस-पास के गांव जैसे देवीधुरा, रुसी आदि के कृषकों ने इस प्रजाति को अपना लिया है और धनिया की खेती कर रहे हैं। धनिया की हरी पत्ती बाजार में बेचकर अच्दा लाभ कमा रहे हैं जो कि निम्न तालिका से स्पष्ट है।

    फसल प्रजाति उपज कु./है. उपज में प्रतिशत वृद्वि (लोकल की तुलना में) कुल आय रु/है. शुद्व लाभ रु/है.
    धनिया पन्त हरितिमा 10.3 30.3 39656 26176

    बेमौसमी सब्जी उत्पादन

    ज्ंागलिया गांव भीमताल मुख्यालय से लगभग 25 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यह गांव नैनीताल जनपद के भीमताल ब्लाक के अन्तर्गत है। गांव के किसान पुराने परम्परागत ढंग से खेती करते हैं। सन् 2005 में गांव के कुछ कृषक श्री पदम सिंह कुल्याल, श्री हरीश राम और श्री मोहन चन्द्र आदि कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों से मिले तथा खेती में अच्छी आय प्राप्त करने की इच्छा जाहिर की। श्री पदम सिंह कुल्याल लगभग 20 नाली में सब्जियों का उत्पादन करते हैं। वह अप्रैल माह मंे फें्रचबीन की बुवाई करते थे। केन्द्र के वैज्ञानिकों ने उन्हें फे्रंचबीन की बेमौसमी उत्पादन करने की सलाह दी। फ्रेचबीन की वैज्ञानिक खेती पर गांव में प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया तथा फ्रेचबीन की उन्नत प्रजाति पन्त अनुपमा को अगस्त माह में बोने की सलाह थी। श्री पदम सिंह कुल्याल एक प्रगतिशील और परिश्रमी कृषक हैं उन्होंने वैज्ञानिकों की सलाह मानी और जंगलिया गांव में लगभग 10 कृषकों के खेतों पर लगभग 1.0 हैक्टेयर क्षेत्रफल में फेंचबीन पर प्रदर्शन लगाये गये। फेंचबीन की बुवाई अप्रैल और अगस्त माह में कराई गई। अगस्त में बुवाई करने पर अप्रैल की बुवाई की तुलना में अधिक उपज प्राप्त हुई तथा कृषकों को अच्छा लाभ मिला चूंकि अक्टूबर नवम्बर में फे्रंचबीन का अधिक मूल्य मिलता है। इससे प्रेरित होकर गांव के अधिकतर लोगों ने यह तकनीक अपनाई तथा अगले वर्ष कृषकों ने फें्रचबीन (पन्त अनुपमा) लगभग 2 हैक्टेयर क्षेत्रफल में लगाई तथा बहुत अच्छा लाभ प्राप्त किया और सन्तुष्ट होकर केन्द्र के वैज्ञानिकों का धन्यवाद दिया। अब जंगलिया गांव के आस पास के गांवों के लोग भी फ्रेंचबीन की बुवाई अप्रैल के बजाय अगस्त में करने लगे हैं। वैज्ञानिकों की सलाह से लगाये गये प्रदर्शन का ब्यौरा निम्न तालिका से स्पष्ट है।

    फसल प्रजाति बुवाई का समय औसत उपज कु./है. उपज में प्रतिशत वृद्वि शुद्व लाभ रु/है.
    फें्रचबीना पन्त हरितिमा 16 अपै्रल 70.7 64250
    12 अगस्त 90.3 27.7 136100

    गेहॅंू की नई प्रजाति का प्रदर्शन

    मटियाली गांव के कृषक श्री धर्मानन्द पाण्डे जो कि पूर्ण रुप से सब्जियों और धान्य फसलों की खेती पर ही आश्रित हैं। अतः वह वैज्ञानिकों द्वारा बताई गई कृषि की नवीन तकनीकों को तुरन्त पहचानते हैं। श्री पाण्डे बताते है कि 2006 तक गेहूंॅ की पुरानी प्रजातियों के प्रयोग से गेहूॅं की अच्छी फसल नहीं ले पा रहे थे। गेहूंॅ की फसल में खरपतवार एवं रोगों की समस्या अधिक हो रही थी वर्ष 2007 में उन्होंने कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों की सलाह मानी और गेहूॅं की नवीनतम प्रजाति यू.पी. 2572 का प्रदर्शन 0.5 हैक्टेयर क्षेत्र में लगाया गेहूं की बुवाई 20 सेमी. की दूरी पर पंक्तियों में कराई जिससे खरपतवार निकालने में आसानी हो गई। गेहूॅं की फसल जब तैयार हुई तो आश्चर्य जनक परिणाम प्राप्त हुए। जैव अभिकर्ताओं के प्रयोग से उन्हें बीमारियों के नियन्त्रण में काफी मदद मिली। यू.पी. 2572 का 3.5 कुन्तल बीज उन्होंने अगले वर्ष के लिए भण्डारण में सुरक्षित रख लिया और वर्ष 2008 में अपने खेतों में उत्पन्न बीज का प्रकोप किया तथाा सन्तोषजनक लाभ प्राप्त किया। श्री पाण्डे से प्रेरित होकर पास के गांव ज्योली, कौसानी और चोपड़ा के श्री शंकर भट््ट, श्री जगमोहन राम आदि किसानों ने गेहूॅं की प्रजाति यू.पी. 2572 की खेती करना आरम्भ कर दिया और अच्छा लाभ प्राप्त किया। गेहूंॅ के प्रदर्शन कार्यक्रम के परिणाम निम्न तालिका से स्पष्ट हैं।

    फसल प्रजाति बुवाई का समय उपज कु./है. उपज में प्रतिशत वृद्वि शुद्व लाभ रु/है.
    गेहूंॅ लोकल 30 अक्टूबर 23.6 17710
    यू.पी. 2572 12 अगस्त 37.6 59.3 33796

    मुर्गी पालन

    कृषि विज्ञान केन्द्र, ज्योलीकोट पर आयोजित कृषि महोत्सव 2008 के दौरान गा्रम भल्यूटी के श्री हृदयेश बोरा ने मुर्गी पालन के बारे में जानकारी चाही। पशु पालन के वैज्ञानिक ने उन्हें मुर्गी पालन के बारे में बताया और इसी क्रम में गा्रम भल्यूटी में बैकयार्ड मुर्गी पालन पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें गांव के काफी लोगों ने भाग लिया। गा्रम भल्यूटी कृषि विज्ञान केन्द्र से मात्र 1 किमी. की दूरी पर स्थित है। प्रशिक्षण के उपरान्त श्री बोरा जी ने बैकयार्ड मुर्गी पालन का कार्य अपने आवास पर आरम्भ किया जिसके लिए कृषि विज्ञान केन्द्र ने उन्हें क्रायलर प्रजाति के चूजों की आपूर्ति की। लगभग 2 माह बाद चूजे बड़े हो गये। केन्द्र द्वारा समय-समय पर उनके चूजों का निरीक्षण किया गया तथा आवश्यक दवाइयां दी। श्री बोरा जी ने मुर्गे बेचकर अच्छा लाभ प्राप्त किया अगले वर्ष जब कृषि विज्ञान केन्द्र पर किसान मेला आयोजित किया गया तो उसमें बोरा जी ने मुर्गी पालन के बारे में अन्य किसानों को भी बताया कि यह एक कम लागत वाला और अच्छी आय प्राप्त करने वाला व्यवसाय है इस व्यवसाय को घर पर आसानी से किया जा सकता है बोरी जी से प्रेरित होकर पास के गांव के किसान श्री दीवान सिंह, श्री कमल जीना, श्री राहुल प्रसाद, श्री विजय शर्मा, श्री बच्ची लाल और श्री मोहित कुमार ने मुर्गी पालन का व्यवसाय वैज्ञानिकों की सलाह से आरम्भ किया। इस प्रकार केन्द्र के आस पास लगभग 10 मुर्गी पालन की इकाई स्थापित हो चुकी हैं। किसानों ने पोल्ट्री रिसर्च सेन्टर पन्तनगर से 1000 चूजे खरीदे तथा लगभग दो माह बाद प्रति किसान लगभग 5400 रुपये का शुद्व लाभ प्राप्त किया जिससे सभी किसान सन्तुष्ट हैं। किसानों द्वारा स्थापित मुर्गी पालन इकाई का आय व्यय का विवरण निम्नलिखित है।

    प्रति किसान आय-व्यय का विवरण

    100 चूजों का मूल्य रु 9/चूजा = 900.00

    आहार पर खर्च रु 22/चूजा = 2200.00

    दवाइयां रु 5/चूजा = 500.00

    कुल खर्च = 3600.00

    दो माह बाद मुर्गो का मूल्य रु 90 प्रति के हिसाब से 9000.00

    शुद्व आय = कुल आय - कुल खर्च

    9000 - 3600 = 5400.00


    स्थानीय फल/सब्जियों का मूल्यवर्धन

    गा्रम हरतोला कृषि विज्ञान केन्द्र, ज्योलीकोट से लगभग 75 किमी. की दूरी पर (ब्लाक रामगढ़) में स्थित है। गांव दूरस्थ क्षेत्र में होने के कारण संचार व्यवस्था तथा परिवहन व्यवस्था अच्छी नहीं है। सन 2008 में गांव में टमाटर पर प्रदर्शन कार्यक्रम चलाया गया। इसी क्रम में वहां कृषक गोष्ठी आयोजित की गयी। गोष्ठी के दौरान स्वयं सहायता समूह की श्रीमती स्वर्ण जयन्ती तथा श्रीमती महिला जयन्ती ने अपनी समस्या कृषि विज्ञान केन्द्र, ज्योलीकोट के वैज्ञानिकों के समक्ष रखी। उन्होंने बताया कि हमारे गांव में सेब, नाशपाती, नींबू, बुरास तथा टमाटर आदि की खेती होती है मगर फल/सब्जियों का अच्छा मूल्य नहीं मिलता है तथा इनकी मूल्यवर्धन की वैज्ञानिक तकनीक से हम अनभिज्ञ हैं। गा्रमवासियों की समस्या ध्यान में रखते हुए, गा्रम हरतोला में केन्द्र के गृह वैज्ञानिक द्वारा गांव में प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किये गये। सेब का जैम, नींबू का अचार, बुरास का स्क्वैश तथा टमाटर का सास तैयार करने पर प्रशिक्षण दिये गये। प्रशिक्षण प्रयोगात्मक रुप से करके दिखाये गये। उत्पाद खराब ना हो और लम्बे समय तक चलते रहें इसके लिए आवश्यक पररक्षित पदार्थो की जानकारी दी गयी तथा वितरित किये गये। प्रशिक्षण लेने के बाद गांव की महिलाओं ने फल/सब्जियों के उत्पाद तैयार किये और बाजार में बेचकर लाभ कमाया। गांव की लगभग 20 महिलाओं ने यह व्यवसाय प्रारम्भ कर दिया है जिससे उनके फल/सब्जियों का सदुपयोग हो रहा है और आय भी अच्छी हो रही है। प्रति किसान उत्पादों का आय व्यय का विवरण निम्न तालिका से स्पष्ट है।

    क्रम सं फल/सब्जी उत्पाद के नाम कुल उत्पाद (किगा्र में) कुल आय रुपये में शुद्व लाभ रुपयों में
    1 सेब जैम 20.00 1500.00 1000.00
    2 नींबू अचार 30.00 1600.00 1200.00
    3 टमाटर सास 25.00 1550.00 1125.00
    4 बुरास स्क्वैश 50.00 3000.00 2000.00